Bundelkhand Krishi Darshan


Vigyan Se Kishan Tak...

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Importance of deep "Summer Ploughing"

Posted by BKD on May 19, 2020 at 10:55 AM Comments comments (0)

गर्मियों में खेत की गहरी जुताई का महत्व


किसान भाइयों गर्मी की गहरी जुताई का समय रबी फसल कटाई के तत्काल बाद से लेकर  मई के अंत तक उपयुक्त माना गया है। यदि तय समय  में खेत की गहरी जुताई कर ले तो  लगभग  50-55 फीसदी तक फसलों की पैदावार बढाई जा सकती है । गर्मी  में गहरी जुताई किए जाने से भूमि की जल धारण क्षमता में भी वृद्धि हो जाएगी और खेतों में ज्यादा समय तक नमी बनी रहेगी। गहरी जुताई  मूंगफली, उर्द , मूंग आदि फसलों के लिए महत्वपूर्ण है। इससेे खेत में लंबे समय तक नमी बनी रहती है  और फसलों में  ज्यादा पानी देने की  जरूरत नहीं होगी।गहरी जुताई करने  से गर्मी में तेज धूप से खेत के नीचे की सतह पर पनप रहे कीड़े-मकोड़े बीमारियों के जीवाणु  व  खरपतवार के बीज आदि नष्ट हो जाते हैं|

                                                                                                                                                                               डॉ. गौरव ( सस्य वैज्ञानिक ) 

soil testing

Posted by BKD on May 1, 2020 at 6:55 AM Comments comments (0)

मिट्टी की जांच

कब?


फसल की कटाई हो जाने अथवा परिपक्व खड़ी फसल में।

प्रत्येक तीन वर्ष में फसल मौसम शुरू होने से पूर्व एक बार।

भूमि में नमी की मात्रा कम से कम हो।


क्यों?


सघन खेती के कारण खेत की मिट्टी में उत्पन्न विकारों की जानकारी।

मिट्टी में विभिन्न पोषक तत्वों की उपलब्धता की दशा का बोधक।

बोयी जाने वाली फसल के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता का अनुमान।

संतुलित उर्वरक प्रबन्ध द्वारा अधिक लाभ।


कैसे?


एक एकड़ क्षेत्र में लगभग 8-10 स्थानों से ‘V’ आकार के 6 इंच गहरे गहरे गढ्ढे बनायें।

एक खेत के सभी स्थानों से प्राप्त मिट्टी को एक साथ मिलाकर ½ किलोग्राम का एक सन्युक्त नमूना बनायें।नमूने की मिट्टी से कंकड़, घास इत्यादि अलग करें।

सूखे हुए नमूने को कपड़े की थैली में भरकर कृषक का नाम, पता, खसरा संख्या, मोबाइल नम्बर, आधार संख्या, उगाई जाने वाली फसलों आदि का ब्यौरा दें।

नमूना प्रयोगशाला को प्रेषित करें अथवा’ ‘परख’ मृदा परीक्षण किट द्वारा स्वयं परीक्षण करें।

seed production technology

Posted by BKD on May 1, 2020 at 6:50 AM Comments comments (0)

बीज का महत्व एवं उत्पादन तकनीकी

प्रदेश के कृषि में बीज गुणता का विशिष्ट महत्व है क्योंकि हमारे यहॉ फसलों की आवश्यकतानुसार सर्वोत्त जलवायु होते हुए भी लगभग सभी फसलों का औसत उत्पादन बहुत ही कम है। जिसका प्रमुख कारण प्रदेश के कृषकों द्वारा कम गुणता वाले बीजों का लगातार प्रयोग है। जिससे फसलों में दी जाने वाली अन्य लागतों का भी हमें पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता है। फसलों में लगने वाले अन्य लागत का अधिकतम लाभ अच्छी गुणता वाले बीजों का प्रयोग करके ही लिया जा सकता है। उच्च गुणवत्ता के प्रमाणित बीज के प्रयोग से ही लगभग 20 प्रतिशत उत्पादकता/उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।

 

अतः किसान भाईयों को चाहिए कि वे अपनी फसलों के बीज जैस-धान, गेहूं, समस्त दलहनी फसलें एवं राई-सरसों तथा सूरजमुखी को छोड़कर समस्त दलहनी फसलों का बीज प्रत्येक तीन वर्ष में बदल कर बुवाई की जानी चाहिए।इसी प्रकार ज्वार, बाजरा, मक्का, सूरजमुखी, अरण्डी एवं राई/सरसों की फसलों में प्रत्येक तीन वर्षा पर बीज बदल कर बुवाई की जानी चाहिए।

 

उस बीज को उत्तम कोटि का माना जाता है जिसमें आनुवांशिक शुद्धता शत-प्रतिशत हो अन्य फसल एवं खरपतवार के बीजों से रहित हो, रोग व कीट के प्रभाव से मुक्त हो, जिसमें शक्ति और ओज भरपूर हो तथा उसकी अंकुरण क्षमता उच्च कोटि की हो, जिसमें खेत में जमाव और अन्ततः उपज अच्छी हो।

 

कृषि विभाग द्वारा खरीफ, रबी एवं जायद फसलों के विभिन्न प्रजाति के प्रमाणित बीजों का वितरण सभी जनपदों के विकास खण्ड स्थिति बीज भण्डार के माध्यम से उपलब्ध कराया जा रहा है।

 

अतः किसान भाईयों से अनुरोध है कि अपने विकास खण्ड से बीज प्राप्त कर अपने पुराने बीजों को बदलते हुए प्रमाणित बीजों से बुवाई करें, जिससे उनकी फसलों के उत्पादन में वृद्धि हो।

 

शोधित बीज बच जाने पर पुनः प्रयोग करें। बीज प्रयोगशाला से पुनः जमाव परीक्षण कराकर मानक के अनुरूप होने पर पुनः बोया जा सकता है।

बीज

पौधे का वह भाग जिसमें भ्रूण अवस्थित है, जिसकी अंकुरण क्षमता, आनुवंशिक एवं भौतिक शुद्धता तथा नमी आदि मानकों के अनुरूप होने के साथ ही बीज जनित रोगों से मुक्त है।

 

बीज के प्रकार

केन्द्रीय प्रजाति विमोचन समिति (सी०वी०आर०सी०;) के विमोचन एवं भारत सरकार की अधिसूचना के उपरान्त ही बीज उत्पादति किया जा सकता है। अधिसूचित फसलों/प्रजातियों की निम्न श्रेणियॉ होती है।

 

1. प्रजनक बीज

यह बीज नाभकीय (न्यूक्लियस;) बीज से बीज प्रजनक अथवा सम्बन्धित पादक प्रजनक की देखरेख में उत्पादित किया जाता है जिसकी आनुवंशिक एवं उच्च गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा जाता है। यह आधारीय बीज के उत्पादन का स्रोत है। इस बीज के थैलों पर सुनहरा पीला (गोल्डन;) रंग का टैग लगता है जिसे सम्बन्धित अभिजनक द्वारा जारी किया जाता है।

 

2. आधारीय बीज

इस बीज का उत्पादन प्रजनक बीज से किया जाता है आवश्यकतानुसार आधारीय प्रथम से आधारीय द्वितीय बीज का उत्पादन किया है। इसकी उत्पादन, संसाधन, पैकिंग, रसायन उपचार एवं लेबलिंग आदि प्रक्रिया बीज प्रमाणीकरण संस्था की देखरेख में मानकों के अनुरूप होती है। इसके थैलों में लगने वाले टैग का रंग सफेद होता है।

 

3. प्रमाणित बीज

कृषकों को फसल उत्पादन हेतु बेचे जाने वाला बीज प्रमाणित बीज है जिसका उत्पादन आधारीय बीज से बीज प्रमाणीकरण संस्था की देख रेख में मानकों के अनुरूप किया जाता है। प्रमाणित बीज के टैग का रंग नीला होता है।

 

4. सत्यापित बीज (टी०एल०;)

इसका उत्पादन, उत्पादन संस्था द्वारा आधारीय/प्रमाणित बीज से मानकों के अनुरूप किया जाता है। उत्पादन संस्था का लेविल लगा होता है या थैले पर उत्पादक संस्था द्वारा नियमानुसार जानकारी उपलब्ध कराई होती है।

 

बीज उत्पादन तकनीकी प्रक्रिया

इस विधि में एक योजना बनाकर बीज मानकों के अनुरूप वैज्ञानिक तरीकों से उत्पादित किया जाता है ताकि उत्पादन, संसाधन, भण्डारण एवं वितरण का कार्य प्रभावी ढंग से निष्पादित एवं बीज की गुणवत्ता बीज के बोने तक बनी रहे। इस प्रक्रिया की निम्न विशेषतायें हैं

 

आनुवंशिक एवं भौतिक रूप से शुद्ध आधार बीज का उपयोग किया जाता है।उन्नत कृषि सस्य विधियों एवं फसल सुरक्षा को अपनाया जाता है।आनुवंशिक या भौतिक संदुषण के स्रोतों से निर्दिष्ट प्रथक्करण दूरी का ध्यान रखा जाता है।अनुपयुक्त पौधों की बीज फसल से समय पर निकाला जाता है।खरपतवार और अन्य फसलों के पौधों को भी समय से निष्कासित किया जाता है ताकि इन बीजों का फसल बीजों में मिश्रण न हो पायें।रोगग्रस्त पौधों को भी समय से रोग फैलाने के पूर्व निकाल दिया जाता है।बीज फसल की कटाई, गहाई, मड़ाई, सफाई आदि में विशेष सावधानी रखी जाती है ताकि यॉत्रिक क्षति एवं मिश्रण न हो।भण्डारण के समय कीट, रोग संक्रमण आदि की रोकथाम हेतु विशेष ध्यान दिया जाता है।आनुवंशिक एवं भौतिक शुद्धता की जॉच के लिए परीक्षण किये जाते हैं इसके अतिरिक्त अंकुरण परीक्षण, आद्रता परीक्षण आदि भी किये जाते हैं।बीजों का संसाधन विशेष सर्तकता के साथ किया जाता है ताकि बीजों की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बनी रहे।संसाधित बीज को उपयुक्त थैलों में भरकर प्रमाण पत्र संलग्न कर सील किया जाता है।न्यून तापमान एवं आद्रता पर बीजों का भण्डारण किया जाता है जिससे रोग एवं कीट से बीज सुरक्षित रहे एवं अंकुरण क्षमता प्रभावित न हो।

गुणवत्ता

बीजों की गुणवत्ता को वॉछित स्तर पर सुनिश्चित करने के लिए बीज प्रमाणीकरण का प्राविधान है। जनक बीजों का प्रमाणीकरण गठित समिति द्वारा किया जाता है जबकि आधारीय एवं प्रमाणिता बीजों का प्रमाणीकरण का उत्तरदायित्व प्रदेश की बीज प्रमाणीकरण संस्था का है। प्रमाणीकरण की प्रक्रिया निम्न चरण में पूर्ण की जाती है।

 

1. बीज का सत्यापन

आधारीय एवं प्रमाणित बीजों के उत्पादन हेतु क्रमशः प्रजनक एवं आधारीय बीजों का प्रयोग आवश्यक है। उसी श्रेणी के बीज से उसी श्रेणी के बीज उत्पादन की अनुमति विशेष परिस्थितियों में दी जाती है। बीज प्रमाणीकरण संस्था निरीक्षण के समय बिल, भण्डार रसीद तथा टैग से बीज स्रोत का सत्यापन करती है।

 

2. फसल निरीक्षण

पुष्पावस्था एवं फसल पकने के समय दो निरीक्षण आवश्यक हैं। निरीक्षण के समय बीज फसल में अवॉछित पौधे नहीं होने चाहिए। फसल भी खरपतवार रहित होनी चाहिए। निरीक्षण के समय खेत में जगह-जगह पर काउन्ट लिये जाते हैं। काउन्ट की संख्या खेत क्षेत्रफल तथा एक काउन्ट पौधों की संख्या पर निर्भर करती है। यदि काउन्ट में आवॉदित पौधों की संख्या निर्धारित मानक से अधिक है तो फसल निरस्त कर दी जाती है।

 

3. प्रयोगशाला परीक्षण

विधायन के उपरान्त प्रत्येक लाट से न्यायदर्श लेकर प्रयोगशाला में परीक्षण हेतु भेज दिया जाता है। जनक बीजों का परीक्षण विश्वविद्यालय की तथा आधारीय व प्रमाणित बीजों का परीक्षण बीज प्रमाणीकरण संस्था की प्रयोगशाला में किया जाता है। यदि कोई न्यायदर्श बीज मानक के अनुरूप नहीं पाया जाता है तो उसको निरस्त कर दिया जाता है। आधारीय व प्रमाणित बीजों का परीक्षण बीज प्रमाणीकर संस्था की प्रयोगशाला में किया जाता है। यदि कोई न्यायदर्श बीज मानक के अनुरूप नहीं पाया जाता है तो उसकों निरस्त कर दिया जाता है।

 

4. टैगिंग

विधियन के उपरान्त बीजों को ऐसे आकार के थैलों में भरा जाता है कि उसमें एक एकड़ बुवाई हेतु बीज आ जाय। जनक बीज पर सुनहरी पीले रंग का टैग सम्बन्धित प्रजनक तथा आधारीय व प्रमाणित बीजों पर क्रमशः सफेद व नीले रंग के टैग बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा उपलब्ध कराये जाते है।


weed management in moong

Posted by BKD on May 1, 2020 at 4:35 AM Comments comments (0)

मूंग की खेती में खरपतवार नियंत्रण
बुआई के 25 से 30 दिन तक खरपतवार फसल को अत्यधिक नुकसान पहुंचाते हैं| यदि खेत में खरपतवार अधिक हैं, तो बोवाई के 20 से 25 दिन के बाद निराई कर देना चाहिए| दूसरी निंराई बुआई के 45 दिन के बाद करनी चाहिए| जिन खेतों में खरपतवार गम्भीर समस्या हों वहाँ खरपतवार नाशक रसायन का छिड़काव करने से खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है| इसके लिए पेन्डीमिथालीन 30 ई सी, 750 से 1000 ग्राम मात्रा (सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर;) बुवाई के 0 से 3 दिन तक प्रयोग करें| 

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